यंत्र पूजा के रहस्य और लाभ

प्रस्तुत पोस्ट में यंत्रों के बारे में विस्तृत व्याख्या, यंत्रों की उत्पत्ति, उपादेयता, धारण विधि, मंत्र, मुहूर्त व लाभ आदि के बारे में जानकारी दी गयी है। इस पोस्ट के अध्ययन से पाठक अनेक रहस्यों से परिचित होंगे तथा इनकी उपयोगिता को समझने में उन्हें सरलता होगी।

यंत्र की उत्पत्ति

महर्षि दत्तात्रेय को यंत्र का जनक माना जाता है, महर्षि दत्तात्रेय ने शिल्प कला और ज्यामितीय रेखांकन के द्वारा वृत्त, त्रिकोण, चाप, अर्द्धवृत्त, चतुष्कोण तथा षटकोण को आधार मानकर बीज मंत्रों द्वारा इष्ट शक्ति को रेखांकित करके अति विशिष्ट दैवीय यंत्रों का आविष्कार किया, यंत्र इष्ट शक्ति को आबद्ध करने की सर्वोच्च विधि है।

महर्षि दत्तात्रेय के बाद अन्य मनीषियों ने भी यंत्र विद्या को बढ़ावा दिया परन्तु गुरु गोरखनाथ और भगवत्पाद शंकराचार्य का समय यंत्र विद्या का स्वर्णिम काल था, जिसका वर्णन आज भी अति प्राचीन ग्रंथों में देखा जा सकता है। जहाँ महर्षि दत्तात्रेय यंत्र विद्या के जनक थे वहीं गुरू गोरखनाथ एवं भगवद्पाद शंकराचार्य ने यंत्र विद्या की कीर्ति पताका को भारत में ही नहीं अपितु विश्व के कोने-कोने तक फहराया और यंत्र विद्या को देश विदेश में स्थापित किया।

गुरु गोरखनाथ रचित “बीसायंत्र” तो आज भी इतना तेजस्वी और प्रचलित है कि इसके स्थापन मात्र से ही दरिद्रता, रोग, शोक और बाधाएं चमत्कारिक ढंग से स्वयं दूर हो जाती हैं।

अगर साधारण व्यक्ति भी यंत्रों का प्रतिदिन दर्शन करे तो उसकी कामनायें सिद्ध होती हैं। दैवीय यंत्रों के प्रमुख पांच अंग माने जाते हैं। 1. बिन्दु 2. त्रिकोण 3. वृत्त 4. पद्मदल व 5. चतुष्कोण ।

पराशक्ति के प्रथम विकास का सूचक “त्रिकोण है क्योंकि आकाश (शून्य) को तीन से कम रेखाओं द्वारा घेरा ही नहीं जा सकता। इसी से इसे प्रकृति का मूल माना गया है, यंत्र में जिस त्रिकोण का शीर्ष नीचे की ओर होता है उसे “शक्ति त्रिकोण” कहते हैं, और जिसका शीर्ष ऊपर की ओर होता है वह “शिव त्रिकोण” कहलाता है।

यंत्र की महिमा

भौतिक जीवन में आनन्द, उमंग और उत्साह होना अत्यन्त आवश्यक है परन्तु चिन्ताओं से ग्रसित लोगों को हमेशा खुशियों से वंचित पाया गया है और अनेक चिन्तायें मनुष्यों को घेरती जा रही हैं। कभी स्वास्थ्य, कभी व्यापार, कभी कर्ज की चिन्ता, बिमारी की चिन्ता, संन्तान एवं विवाह की चिंता आदि ऐसी हजारों चिन्तायें हैं जिनसे छुटकारा पाने के लिए यंत्र एक सरल एवं चमत्कारिक विधि है तथा मनीषियों ने यही सरल उपाय बताया है। अगर यंत्रों को मानव जीवन के लिए उपयोग में लाया जाए तो उन्हें अवश्य ही सफलता मिलती है।

यंत्र के सहारे अनेक लोगों ने दुर्लभ कार्य को सम्पन्न किया है व ऐश्वर्य पाया है। साधारण सा दिखने वाली वस्तु अपने आप में एक असीमित शक्ति को समाहित किए रहती है जिसे साधारण व्यक्ति समझने में आज असफल है। उठो, जागो और इसी क्षण अपने श्रेष्ठ जीवन निर्माण का संकल्प करो, यंत्रों को उपयोग में लाओ अन्यथा बाकी का जीवन भी बीते हुये जीवन की तरह चला जायेगा ।

यंत्र का उपयोग

यंत्र का उपयोग जन्म से मरण तक प्रत्येक क्षण आवश्यक है, गर्भवती महिला के लिए प्रसव से सम्बन्धित परेशानियों से बचने के लिए। नवजात शिशु के लिए ऊपरी बाधाओं से बचना। बालकों के लिए प्रखर बुद्धि एवं विद्या पाने के लिए तथा शारीरिक स्वास्थ्य के लिए युवा पीढ़ियों के लिए कार्यालय, व्यापार, समाज आदि में उन्नति हेतु तथा धन ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए बड़े व्यापारियों के लिए व्यापार वृद्धि एवं लक्ष्मी प्राप्ति के लिए अज्ञात् शत्रुओं से बचने के लिए, भयंकर बीमारियों से छुटकारा पाने के लिए मस्तिष्क को शान्ति पाने के लिए महिलाओं के लिए स्वरून एवं शारीरिक रक्षा हेतु यंत्र ही एक ऐसी विधि है जिसके द्वारा किसी भी धर्म सम्प्रदाय एवं अवस्था के व्यक्ति अपने-अपने क्षेत्रों में सफलता पाने के लिए उससे सम्बन्धित यंत्रों को उपयोग करके सफलता प्राप्त कर सकते हैं।

साधना के मार्ग में सर्वप्रथम यंत्रों की ही उपासना होती है। कुछ लोगों के मन में संशय भी है कि इस मार्ग में सफलतायें कम प्राप्त होती हैं। आज का मनुष्य यह चाहता है कि जैसे बिजली का बटन दबाते ही प्रकाश मिल जाता है पंखे चालू होकर तुरन्त शीतल हवा प्रदान करने लगते हैं ऐसा ही कोई आध्यात्मिक उपकरण होना चाहिये जो ज्यादा नियम, संयम और परिश्रम साध्य न हो, परन्तु तुरन्त लाभदायी हो अतः दैवीय यंत्र साधना निश्चय ही अद्वितीय प्राचीनतम खोज है, श्रेष्ठ जीवन-यापन की कामना रखने वालों के लिये कल्प वृक्ष के समान है।

गुणवत्ता एवं परख

यंत्र विषय से सम्बन्धित आज अनेक प्रश्न चिन्ह सामने आ रहे हैं। लोगों के मन में इस विषय को लेकर अनेक प्रकार की भ्रांतियां उत्पन्न हो रही हैं बाजार में छोटी-मोटी दुकानों पर भी आज अनेक प्रकार के यंत्र बेचे ज रहे हैं जिसका निर्माण न तो अच्छी धातु में हुआ है और न ही उनपर रेखांकित यंत्र विद्या से सम्बन्धित त्रिभुज, अष्टदल, भूपुर, बीजमंत्र, बिन्दु, वृत्त आदि में शुद्धता है।

एक साधारण व्यक्ति इसकी परख करने में असफल होता है और बिना सोचे समझे वह यंत्र को क्रय करता है और उपयोग में लाता है, परन्तु उसे इससे कोई लाभ नहीं प्राप्त होता । कभी-कभी तो ऐसी स्थिति में उल्टा फल प्राप्त हुआ है, और अनेक लोगों के जीवन में तरह-तरह की घटनायें भी घटित हुई हैं।

अगर यंत्र को किसी विशेष संस्था से प्राप्त किया जाये जिस संस्था ने आध्यात्मिक क्षेत्र में सराहनीय कार्य किय हो और विशेष व्यक्तियों द्वारा यंत्र निर्मित किया हो तथा उसकी गुणवत्ता एवं निर्माण पर अनेक विद्वानों से सहयोग लिया हो। ऐसी ही संस्थाओं से यंत्र को प्राप्त करके उसकी उपासना की जाये तो अवश्य ही सफलता मिलती है।

यंत्र की मुख्य परख उसके आकार पर निर्भर करती है आकार में शुद्धता होनी चाहिए। यंत्र खुरदरा न हो तथा धातु पर बना हुआ यंत्र का त्रिभुज एवं बीज मंत्र अन्दर की ओर खोद कर न बनाये गये हों बल्कि ऊपर की ओर उभरे हुये बीज मंत्रों के अक्षर होने चाहिए तथा प्रत्येक अक्षर स्पष्ट एवं अपने निश्चित स्थान पर होने चाहिए।

धारण तथा मंत्र

सोऽहं यंत्र का प्राण माना जाता है किसी भी यंत्र को प्रतिष्ठित एवं जागृत करने के लिए ईषान आदि चारों कोणें में इसी बीज मंत्र के द्वारा पूजा की जाती है उस यंत्र से सम्बन्धित देवता की षोडषोपचार विधि से पूजा अर्चन की जाती है दशों दिशाओं में दशदिक्पालों की पूजा होती है यंत्र साधक अपने इष्ट देव का स्मरण करके यंत्र को पंचामृत एवं गंगा जल से अभिसिंचन करके धूप, दीप, नैवेद्य आदि से पूजा करता है। उसके बाद पराभूतलिपि उपासना की जाती है।

भूतलिपि प्रयोग – विनियोग – अस्या भूतलिपेर्दक्षिणामूर्तिऋषिः गायत्रीच्छन्दः वर्णेश्वरीदेवता आत्मनोभीष्टसिद्धयर्थे जपे विनियोगः ।

भूतलिपि मंत्र – अं इं उं ऋ लुं एं ऐं ओं औं हं यं रं वं लंडं कं खं घं गं अं चं छं जं णं टं ठं ढं डं नं तं थं धं दं मं पं फं भं वं शं षं सं ।

इसी मंत्र को विच्छेद करके क्रमशः षडंगन्यास- वर्णन्यास आदि किया जाता है। तत्पश्चात् यह ध्यान करने का विधान है।

अक्षरस्रजं हरिणपोतमुदग्रटंक, विद्यां करैरविरतं दधतीं त्रिनेत्राम् । अर्धेन्दुमौलिमरुणामरविन्दरामा वर्णेश्वरीं प्रणमतस्तनभारनग्राम् ।।

प्रतिष्ठा विनियोग – अस्य श्रीप्राणप्रतिष्ठामन्त्रस्य अजेशपद्मजाऋषयः ऋग्यजुः सामानि छन्दांसि प्राणशक्तिर्देवता आं बीजं ह्रीं शक्तिः क्रीं कीलकं प्राणस्थापने विनियोगः ।

प्राण प्रतिष्ठा मन्त्र – आं ह्रीं क्रीं यं रं लं वं शं षं सं हों ॐ क्षं सं हं सः ह्रीं ॐ हंसः महाप्राणा इहप्राणाः मम जीव इह स्थितः इहागत्य सुखं चिरं तिष्ठन्तु स्वाहा ॐ क्षं सं हंसः हीं ॐ।

आं ह्रीं क्रीं यं रं लं वं शं षं सं हों ॐ क्षं सं हं सः ह्रीं ॐ हंसः महाप्राणा इहप्राणाः मम सर्वोन्द्रियाणीह स्थितानि इहागत्य सुखं चिरं तिष्ठन्तु स्वाहा ॐ क्षं सं हंसः हीं ॐ।

आं ह्रीं क्रीं यं रं लं वं शं षं सं हों ॐ क्षं सं हं सः हीं ॐ हंसः महाप्राणा इहप्राणाः मम वाङ्मनश्चक्षुः श्रेत्रघाणप्राणा इहागत्य सुखं चिरं तिष्ठन्तु स्वाहा ॐ क्षं सं हंसः ह्रीं ॐ।

इस वैदिक विधि से यंत्र की प्रतिष्ठा एवं पूजा करने के पश्चात् यंत्रों को उपयोग में लाया जाता है।

यंत्रों की प्रतिष्ठा दो प्रकार से होती है। 1. चलप्रतिष्ठा 2. अचल प्रतिष्ठा । चलप्रतिष्ठा वाले यंत्रों को प्रतिष्ठित करने के बाद कहीं भी ले जाया जा सकता है अचल प्रतिष्ठा वाले यंत्रों को प्रतिष्ठित करने के बाद एक निश्चित स्थान पर रखना होता है, इस यंत्र को अन्यत्र ले जाने के लिये शास्त्र अनुमति नहीं है।

प्राणप्रतिष्ठा करने के उपरांत यंत्र को जाग्रत रखने के लिए यंत्र के लिए निर्दिष्ट मंत्र का 108 बार या इससे अधिक यथाशक्ति नियमित रूप से प्रतिदिन संध्या वंदन, प्राणायाम व गुरु पूजा के पश्चात धूप दीप नैवेद्य, पुष्प, फल आदि समर्पित करते हुए जप करें।

1. यंत्रराज श्रीयंत्र

सनातन धर्म संस्कृति में विभिन्न कामनाओं की पूर्ति हेतु विभिन्न यंत्रों की साधना का विधान है। इन यंत्रों का उपयोग ध्यान केंद्रित करने के लिए किया जाता है। ये यंत्र एक दूसरे से भिन्न होते हैं। इनमें श्रीयंत्र सर्वाधिक शक्तिशाली है और इसे यंत्रराज की संज्ञा दी गई है। श्रीयंत्र में सभी देवी देवताओं का वास होता है इसे विचारशक्ति एकाग्रता तथा ध्यान को बढ़ाने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त माना गया । श्रीयंत्र का प्रयोग ध्यान में एकाग्रता के लिए किया जाता रहा है।

आधुनिक वास्तुशास्त्रियों ने माना है कि इस यंत्र के गणितसूत्र के आधार पर बनाए गए मंदिर, आवास या नगर में अत्यधिक सकारात्मक ऊर्जा होती है तथा ऐसे स्थान में रहने वाले लोगों में विचारशक्ति, ध्यान, शांति, सहानुभूति, सौहार्द व प्रेम के गुणों का उद्भव होता है।

श्रीयंत्र आद्याभगवती श्रीललितमहात्रिपुर सुंदरी का आवास है। इसकी रचना तथा आकार के बारे में आदिगुरु शंकराचार्य की दुर्लभकृति सौंदर्यलहरी में बड़े रहस्यमय ढंग से चर्चा की गई है। महालक्ष्मी को सभी देवियों में श्रेष्ठ माना जाता है और श्रीललितामहात्रिपुर सुंदरी भगवती महालक्ष्मी का श्रेष्ठतम रूप है।

श्रीयंत्र ॐ शब्द ब्रह्म की ध्वनितरंगों का साकार चित्र है। ऐसा कहा जाता है कि जब ॐ का उच्चारण किया जाता है तो आकाश में श्रीयंत्र की आकृति उत्पन्न होती है भारत का सर्वश्रेष्ठ और सर्वाधिक पूजनीय यंत्र श्रीयंत्र ही है। यह समूचे ब्रह्मांड का प्रतीक है जिसे श्री चक्र भी कहा जाता है।

जन्म कुंडली में सूर्य ग्रह के पीड़ित होने पर श्रीयंत्र की पूजा का विधान शास्त्रों में वर्णित है। श्रीयंत्र शब्द की उत्पत्ति श्री और यंत्र के मेल से हुई है। श्री शब्द का अर्थ है लक्ष्मी अर्थात संपत्ति। इसलिए इसे संपत्ति प्राप्त करने का यंत्र भी कह सकते हैं।

श्रीयंत्र की अधिष्ठात्री देवी भगवती श्री ललिता महात्रिपुरसुंदरी हैं। संसार की सर्वाधिक सुंदर व श्रेष्ठतम वस्तु को ललिता कहा जाता है। ललिता शब्द का शाब्दिक अर्थ है- वह जो क्रीड़ा करती है। सृष्टि, स्थिति व विनाश को भगवती की क्रीड़ा कहा गया है। त्रिपुर शब्द का अर्थ है- तीन लोक त्रिशक्ति, त्रिदेव, सत् चित् आनंदरूप, आत्मा, मन, शरीर इत्यादि। इसका शाब्दिक अर्थ है त्रिशक्तियों – महाकाली, महालक्ष्मी व महासरस्वती से पुरातन ।

भगवती श्री ललिता महात्रिपुरसुंदरी को दशमहाविद्याओं में श्री विद्या नाम से जाना जाता है। इनके 16 अक्षरों के मंत्र को भी श्री विद्या नाम से ही पुकारा जाता है। इनके यंत्र को श्रीयंत्र कहा जाता है।

तात्पर्य यह कि श्री व श्रेष्ठता की उच्चतम अभिव्यक्ति श्रीविद्या पराम्ना षोडशी भगवती राजराजेश्वरी श्रीललितामहात्रिपुरसंदरी ही श्रीयंत्र की अधिष्ठात्री शक्ति हैं। इनके बारे में कहा गया है कि कोटि-कोटि जिह्वाएं भी इनके माहात्म्य का वर्णन नहीं कर सकती हैं।

श्रीयंत्र की उपासना में प्रयोग होने वाले मंत्र के छः प्रकार के भावार्थ, लोकार्थ, संप्रदायार्थ इत्यादि लगाए गए हैं। इससे स्पष्ट होता है कि ये मंत्र कितने महत्वपूर्ण व गोपनीय हैं।

ज्ञान के अहंकार में मदमस्त होकर बिना गुरु दीक्षा के मंत्र का जप करना विनाशकारी है। इस मंत्र की दीक्षा सुयोग्य संत या आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा चार शांकर पीठों में स्थापित गुरुशिष्य परंपरा के अंतर्गत जगद् गुरुशंकराचार्य 1 के आसन पर बैठे संत से ली जा सकती है। इस प्रकार से दीक्षित भक्त श्रीयंत्र की उपासना का पूर्ण फल प्राप्त कर सकता है।

जब भगवान शिव ने 64 तंत्रों से समस्त भुवन को भर दिया और उनका मन फिर भी शांत नहीं हुआ, तो उन्होंने सभी पुरुषार्थों की सिद्धि देने वाले श्रीयंत्र व इसकी उपासना की पद्धति को स्वतंत्र रूप से इस पृथ्वी पर उतारा।

मंत्रयोग के अनुसार श्रीयंत्र व इसके मंत्र के उच्चारण व निरंतर अभ्यास से कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत किया जा सकता है। इसलिए शास्त्रों में इन मंत्रों का बड़ा ही गौरवपूर्ण वर्णन किया गया है।

श्रीयंत्र की दीक्षा न मिलने की स्थिति में इसके समक्ष श्रीसूक्त का पाठ करने से सुंदर सुरम्य देह, सरस्वती का विशाल कोष, धन का अक्षय भंडार आदि प्राप्त किए जा सकते हैं।

जो लोग दीक्षा नहीं ले सके हों, वे इनके नाम का भजन करके भी इनका अनुग्रह प्राप्त कर सकते हैं।

इस श्रीयंत्र व इसकी शक्ति की कितनी भी महिमा गाई जाए कम है। श्रेष्ठ लाभ के लिए इसे शुद्ध स्थल पर स्थापित करें। सात्विक आहार करें व नियम से पूजा करें, श्रेष्ठ लाभ होगा। धन-संपत्ति, ज्ञान, यश व सौंदर्य प्राप्ति की इच्छा से या ब्रह्म ज्ञान व आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति की इच्छा की पूर्ति के लिए श्रीयंत्र की उपासना अत्यंत श्रेयस्कर है।

लक्ष्मी प्राप्ति के जब सभी उपाय निरर्थक साबित हो जायें तब श्री यंत्र के सम्मुख आदि शंकराचार्य रचित कनकधारा स्तोत्र का पाठ करें इस स्तोत्र के प्रभाव से धन लाभ होता है।

षोडशाक्षरी मंत्र : ह्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल हीं स क ल हीं

महाषोडशी मंत्र : श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौः ॐ ह्रीं क ए ईल हीं ह स क ह ल हीं स क ल ह्रीं सौः ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं ॥

बिना गुरु दीक्षा के इस मंत्र का जप नहीं करनी चाहिए। यह कुंडलिनी को जागृत करने हेतु बहुत ही प्रभावशाली मंत्र है। यह सुंदरता, संपत्ति और ज्ञान प्राप्ति हेतु श्रेष्ठतम है।

स्फटिक श्रीयंत्र

स्फटिक एक सामान्य प्राप्ति वाला रंगहीन तथा प्रायः पारदर्शक मिलने वाला अल्पमोली पत्थर है। यह पत्थर देखने में कांच जैसा प्रतीत होता है। सिलिका आक्साइड का एक रूप यह स्फटिक पत्थर स्वयं में विशेष आब तथा चमकयुक्त नहीं होता, लेकिन विशेष काट में काटने तथा पालिश करने पर इसमें चमक पैदा की जा सकती है। स्फटिक पत्थर से बनी विभिन्न देवी देवताओं की मूर्तियां एवं यंत्र बनाये जाते हैं।

जिस प्रकार से नवग्रह होते हैं। ठीक उसी प्रकार से नौग्रहों की नौ प्रकार की लक्ष्मी होती हैं 1 आद्या लक्ष्मी 2 धान्य लक्ष्मी 3. धैर्य लक्ष्मी 4. गजलक्ष्मी 5 सन्तान लक्ष्मी 6. विजय लक्ष्मी 7 विद्या लक्ष्मी 8. धन लक्ष्मी 9. धान्य लक्ष्मी आदि ।

अनन्त ऐश्वर्य व लक्ष्मी प्राप्ति के लिए श्रीविद्या व श्रीयन्त्र का महत्त्व सर्वाधिक है। श्रीविद्या ही ललिता, राजराजेश्वरी, महात्रिपुरसुन्दरी, बाला, पंचदशी और षोडशी इत्यादि नामों से विख्यात है। श्रीविद्या की साधना हेतु उसके आधारभूत श्रीयन्त्र को समझना प्रथमतः अनिवार्य है। इस श्री यन्त्र’ के सम्मुख आर्तभाव से श्रद्धापूर्वक ‘श्रीसूक्त’ पढ़ने पर बहुतों को धन सम्पत्ति की प्राप्ति हुयी है।

अनेक धर्मशास्त्रों में यह प्रमाण पाया गया है कि स्फटिक श्री यंत्र, दक्षिणावर्ती शंख, गोमती चक्र एवं तुलसी पत्र जिस घर में यह पांचों वस्तुयें एक साथ प्रतिष्ठित की जाती हैं और प्रतिदिन इनकी पूजा एवं दर्शन किया जाता है। वहां धन और ऐश्वर्य की कभी भी कमी नहीं होती है।

स्फटिक के श्रीयंत्र को समस्त प्रकार के श्रीयंत्रों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है तथा स्फटिक में निर्मित श्रीयंत्रमय शिवलिंग की महिमा तो अवर्णनीय है। स्फटिक के श्रीयंत्र की पूजा जीवन पर्यंत की जा सकती है।

पारद श्रीयंत्र

यह पूजा स्थल अथवा किसी भी स्थान पर स्थापित किया जा सकता है। श्री यंत्र को स्थापित करने से आर्थिक स्थिति में सुधार होता है। इस यंत्र के प्रभाव से जीवन के अनेक अभाव दूर होते हैं। यदि नौकरी में अधिकारियों से मतभेद, मनमुटाव तथा तरक्की में विलंब हो तो ये बाधाएं दूर होती हैं।

सूर्य यंत्र

ब्रह्मांड में सूर्य ही सर्वोपरि ग्रह है जिसके इर्द गिर्द सभी सितारे, ग्रह और नक्षत्र घूमते हैं। पृथ्वी के सभी जड़ और चेतन पदार्थों पर इसकी रश्मियों का प्रभाव पड़ता है मौसम, वनस्पति, मानव सभी सूर्य किरणों से प्रभावित होते हैं डॉक्टरों और वैज्ञानिकों की मान्यता है कि उगते हुए सूर्य को जल के माध्यम से देखने पर नेत्र रोगों को दूर करने में सहायता मिलती है। इसके अशुभ होने पर नेत्र रोग, अस्थि रोग, हृदय रोग, पित्त रोग, ज्वर, मूर्च्छा, चर्म रोग, रक्त स्राव आदि हो सकते हैं।

वेदों के अनुसार सूर्य संपूर्ण जगत की आत्मा है। सूर्य का हमारे आध्यात्मिक जीवन तथा भौतिक जीवन से घनिष्ठ संबंध है। जीवन में अच्छी आयु-आरोग्यता इसी ग्रह की कृपा से प्राप्त होती है।

इस यंत्र को सूर्य ग्रह की शुभता के लिए विशेष रूप से घर में स्थापित करके साधना की जाती है। सामान्यतः इस यंत्र के नित्य दर्शन मात्र से ही लाभ हो जाता है। सूर्य की कृपा से साधक व्यक्ति में आत्म-विश्वास की वृद्धि होकर सर्वत्र यश, सुख, धन की प्राप्ति होती है।

सूर्य ग्रह अगर कुंडली में अशुभ या कमजोर स्थिति में हो अथवा सूर्य ग्रह की महादशा / अंतरदशा चल रही हो तो आंख में किसी न किसी प्रकार की पीड़ा या हड्डी संबंधित रोग होने की संभावना रहती है।

ऐसे में इस यंत्र के पूजन से विशेष शांति प्राप्त होती है। आत्म विश्वास में कमी हों, मन बार-बार कुंठित रहता हो, अधिक परिश्रम करने पर भी उत्तम फल न मिलता हो ऐसी स्थिति में इस यंत्र के नत्य दर्शन पूजन से लाभ मिलता है।

 मंत्र :- ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः ।

चंद्र यंत्र

चंद्र जल तत्व, दीर्घ कद का ग्रह है। इसके अशुभ प्रभाव से मनोविकार, मूत्र विकार, पीलिया, नाक रोग, कफ, रक्तचाप, चेहरे से संबंधित रोग, जठर अग्नि का मंद होना, स्त्रियों के संसर्ग से उत्पन्न रोग, अतिसार, क्षय रोग आदि होते हैं।

‘चंद्रभानसोजातः’ वेदों के अनुसार चंद्रमा संपूर्ण प्राणियों के मन का कारक है। इसकी उत्पत्ति विराट पुरुष (परमेश्वर) के मन से हुई है। संपूर्ण जगत के प्राणियों के मन पर इसका प्रभाव पड़ता है, इसके अतिरिक्त चंद्रमा संपूर्ण वनस्पति, औषधियों पर अमृतवर्षा करता है।

इस यंत्र की साधना विशेषतया मानसिक सुख शांति तथा आर्थिक समृद्धि के लिए की जाती है। इस यंत्र के नित्य दर्शन से व्यक्ति का मन प्रसन्न रहता है जिससे व्यवहार में भी सरसता आती है तथा जीवन में व्यक्ति अपनी मृदुल प्रकृति से सफल हो जाता है।

अगर जन्मकुंडली में चंद्र ग्रह अल्पबली हो अथवा अशुभ हो या चंद्र ग्रह की दशा / अंतरदशा के समय इस यंत्र का नित्य पूजन करने से विशेष लाभ होता है।

मन बार-बार अशांत रहता हो तथा किसी कार्य में मन न लगता हो ऐसी परिस्थिति में इस चंद्र यंत्र के नित्य दर्शन पूजन से शांति प्राप्त होती है। शीघ्र लाभ के लिए इस यंत्र में अंकित मंत्र की नित्य एक माला जप करें।

मंत्र :- ॐ श्रीं श्रीं श्रीं सः चन्द्रमसे नमः।

मंगल यंत्र

मंगल ग्रह के अशुभ होने से रक्तचाप, रक्त विकार, खुजली, फोड़ा-फुंसी, रक्तस्राव, कुष्ठ रोग, आकस्मिक दुर्घटना जन्य रोग, अग्नि भय, गुप्त रोग, सूजन, वात, पित्त संबंधी रोग होते हैं।

कार्य सफल होगा या नहीं ऐसी भावनायें बार-बार मन में उठती हैं। कई बार कार्य असफल भी होते हैं। ऐसे कार्यों को निर्धारित करते समय में बिना किसी परेशानी के सफलता पाने के लिए यह यंत्र अत्यन्त उपयोगी है। व्यापार, विदेश गमन, राजनीति गृहस्थ जीवन, नौकरी पेशा आदि में इस यंत्र का उपयोग करने से सुख एवं समृद्धि प्राप्त होती है।

जब वाहन, मकान, नौकरों से कोई न कोई तकलीफ रहती हो व्यापार व्यवसाय में भयानक उतार-चढ़ाव आते हों तथा घाटा होता हो तो ऐसी स्थिति में व्यापारिक एवं व्यवसायिक स्थिति अनुकूल होने के लिए इस यंत्र की पूजा उपासना करना उचित होगा ।

अथक परिश्रम करने के बाद भी वांछित सफलता जिन्हें नहीं मिलती तथा कार्यों में असफलता मिलती है। बार-बार अपयश का सामना होता है। तो ऐसी स्थिति में यह यंत्र अत्यन्त लाभकारी है। इस यंत्र के सम्मुख सिद्धि विनायक मंत्र का जप करने से सुख समृद्धि प्राप्त होती है तथा आकरण हुये अपमान का शत्रु प्रायश्चित करता है और जीवनपर्यन्त सम्मान प्रदान करता है।

मंत्र :- ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः

बुध यंत्र

इसके अशुभ होने से गले के रोग, हिस्टीरिया, चक्कर आना, त्रिदोष ज्वर, टाइफाइड, पांडु, मंदाग्नि, उदर रोग आदि होते हैं। बुध ग्रह का संबंध सौम्यता तथा बुद्धि से है। विशेष रूप से इसका प्रभाव बुद्धि पर रहता है। वर्तमान युग में बुद्धि का और भी महत्व बढ़ गया है। आज जितनी भी विज्ञान ने उन्नति की है वह साखात् मानव बुद्धि का ही चमत्कारिक फल है।

बुध यंत्र की साधना विशेषतया निर्मल बंद्धि तथा विद्या के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने के लिए लाभकारी होती है। इस यंत्र के प्रतिदिन दर्शन मात्र से व्यक्ति की बुद्धि कुशाग्र होती है, व्यवहार में सौम्यता की वृद्धि होती है साक्षात्कार आदि में सफलता मिलती है। जीवन में अनावश्यक रूप से बुद्धि भ्रमित नहीं होती है।

यंत्र का उपयोग जन्म कुंडली में यदि बुध ग्रह अशुभ या निर्बल हो अथवा बुध की महादशा अंतरदशा के समय इस यंत्र की अपने घर में नित्य पूजा करने से उत्तम सुख, शांति प्राप्त होती है। साक्षात्कार आदि में सफलता प्राप्त करने के लिए इस यंत्र की नित्य पूजा करने से साक्षात्कार में सफलता मिलती है।

विशेष शीघ्र सफलता के लिए इस यंत्र में अंकित मंत्र का यंत्र के सम्मुख बैठकर नित्य जप करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

मंत्र :- ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः।

गुरु यंत्र

गुरु के निर्बल होने पर यकृत रोग, मज्जा रोग, मोटापा, दंत रोग, मस्तिष्क विकार, कर्ण रोग, वायु जन्य विकार, तनाव आदि होते हैं। बृहस्पति ग्रह अध्यात्म, विवेक, ज्ञान तथा परोपकार आदि का कारक है।

अध्यात्मिक साधना में सिद्धि के लिए इस ग्रह का विशेष महत्व है, इसके अतिरिक्त पारलौकिक सुख, ज्ञान, विद्या, न्याय, श्रेष्ठ गुण तथा धर्म-कर्म संबंधी कार्यो से इसका धनिष्ठ संबंध है। स्त्री जातक के लिए इस ग्रह से पति सुख का विचार किया जाता है।

बृहस्पति यंत्र की साधना मुख्यतः विद्या प्राप्ति, यश, धन एवं आध्यात्म सुख, शांति के लिए अधिक फलदायी होती है। इस यंत्र के नित्य दर्शन, पूजन से व्यक्ति की अभ्यांतर शक्ति जागृत होती है। जिससे नई चेतना का उदय होता है।

जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में व्यक्ति बुद्धि विवेक से सफल होते हैं। यदि कन्या के विवाह में विलंब हो रहा हो तो इस यंत्र की नित्य प्रति धूप, दीप से पूजा करें। अध्ययन में बाधाएं आती हों, मन न लगता हो ऐसी परिस्थिति में इस मंत्र की नित्य पूजा से लाभ प्राप्त होता है। विशेष इस यंत्र में अंकित मंत्र का प्रतिदिन जप करने से शीघ्र कार्य सिद्धि होती है।

मंत्र :- ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः।

शुक्र यंत्र

शुक्र जल तत्व, मध्यम कद का जलीय ग्रह है। शरीर में यह वीर्य, शुक्राणु जननेन्द्रिय, स्वर, गर्भाशय, नेत्र एवं संवेग शक्ति को प्रभावित करता है इसके निर्बल एवं अशुभ होने पर वीर्य संबंधी रोग, गुप्त रोग, मूत्र विकार, स्त्री संसर्ग जन्य रोग, नशीले द्रव्यों के सेवन से उत्पन्न रोग, मधुमेह, उपदंश, प्रदर रोग, कफ, वायु विकार रोग होते हैं। शुक्र सांसारिक सुखों का प्रदायक ग्रह है। रूप-सौंदर्य, प्रेम, वासना, धन-संपत्ति तथा दाम्पत्य सुख का कारक ग्रह है।

इसके अतिरिक्त नृत्य संगीत, गायन श्रृंगार की वस्तुओं एवं मनोरंजन से जुड़े सिनेमा, टेलिविजन आदि पर इस ग्रह का विशेष प्रभाव है। पुरुषों के लिए यह स्त्री सुख कारक ग्रह है।

शुक्र यंत्र की साधना विशेषतया भौतिक सुख, संपदा, धन, ऐश्वर्य की वृद्धि के लिए करनी चाहिए। इस यंत्र के नित्य दर्शन, पूजन से साधक को जीवन में कभी भी भौतिक सुख-संसाधनों की कमी नहीं होती है। वैवाहिक जीवन मैं दांपत्य सुख की वृद्धि होती है तथा पति-पत्नी के संबंधों में सरसता बनी रहती है।

जब शुक्र ग्रह अशुभ, निर्बल स्थिति में हो, अथवा शुक्र की महादशा /अंतरदशा चल रही हो ऐसे समय में इस यंत्र को अपने घर में स्थापित करके नित्य पूजन, दर्शन से सुख, शंति प्राप्त होती है। गृहस्थ सुख में कमी हो, पति-पत्नी का एक दूसरे के प्रति कम आकर्षण रहता हो, ऐसी स्थिति में इस यंत्र की नित्य पूजा करने से लाभ होता है।

मंत्र :- ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः ।

शनि यंत्र

शनि वायु तत्व, दीर्घ कद का शुष्क ग्रह है। यह शरीर के स्नायु संस्थान, हड्डियों के जोड़, घुटने, पैर, मज्जा और वात को प्रभावित करता है। इसके श्री शनियन्त्रम् अशुभ होने पर स्नायु रोग, जोड़ों में दर्द, अपचन, अपराधी प्रवृत्ति, निराशाजनय मानसिक रोग आदि होते हैं।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शनि प्रतिकूल होने पर अनेक कार्यों में असफलता देता है, कभी वाहन दुर्घटना, कभी यात्रा स्थागित तो कभी क्लेश आदि से परेशानी बढ़ती जाती है ऐसी स्थितियों में ग्रह पीड़ा निवारक शनि यंत्र की शुद्धता पूर्ण पूजा प्रतिष्ठा करने से अनेक लाभ मिलते हैं। यदि शनि की ढैया या साढ़ेसाती का समय हो तो इसे अवश्य पूजना चाहिए।

श्रद्धापूर्वक इस यंत्र की प्रतिष्ठा करके प्रतिदिन यंत्र के सामने सरसों के तेल का दीप जलायें। नीला, या काला पुष्य चढ़ायें। ऐसा करने से अनेक लाभ होगा।

मृत्यु, कर्ज, मुकद्दमा, हानि, क्षति, पैर आदि की हड्डी, बात रोग तथा सभी प्रकार के रोग से परेशान लोगों हेतु यंत्र अधिक लाभकारी है। नौकरी पेशा आदि के लोगों को उन्नति शनि द्वारा ही मिलती है अतः यह यंत्र अति उपयोगी है, जिसके द्वारा शीघ्र ही लाभ पाया जा सकता है।

मंत्र :- ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः ।

राहु यंत्र

राहु वायु तत्व एवं मध्यम कद वाला ग्रह है। यह शरीर में मस्तिष्क त्वचा, रक्त तथा वात को प्रभावित करता है। इसके कुंडली में अशुभ होने पर कृमि रोग, मिरगी, उदर रोग, जहरीले जंतुओं का भय, कुष्ठ, कैंसर आदि होते हैं। राहु का संबंध आकस्मिक लाभ तथा आकस्मिक शुभाशुभ घटनाओं से है, राहु व्यक्ति के जीवन में अस्थिरता लाता है। जीवन में स्थिरता न होने से व्यक्ति की उन्नति रूक जाती है। इसके प्रभाव से मानसिक उलझनें एवं शारीरिक अस्वस्थता रहती है।

जिन व्यक्तियों के जीवन में बहुत प्रयास करने के पश्चात भी अस्थिरता बनी रहती उनको इस यंत्र के नित्य दर्शन पूजन से नई चेतना जाग्रत होती है, साहस तथा पराक्रम की वृद्धि होती है। विरोधियों की पराजय होती है।

राहु ग्रह निर्बल, तथा अशुभ हो, अथवा राहु की महादशा / अंतर्दशा चल रही हो ऐसी स्थिति में इस यंत्र को श्रद्धा, विश्वास पूर्वक घर में स्थापित करके प्रतिदिन पूजन, दर्शन से शुभ फल की प्राप्ति होती है।

परिश्रम करने के पश्चात भी यदि परिश्रम का पूर्ण फल न मिलता हो तथा बार-बार व्यवसाय में परिवर्तन करना पड़ता हो तो ऐसी परिस्थिति में इस यंत्र की नित्य पूजा से मनोवांछित लाभ होता है।

कोर्ट-कचहरी आदि के मामलों से होनेवाली परेशानी से वचन के लए यंत्र की घर पर नित्य विधिवत पूजा करने से अनिष्ट फल की शांति होती है। शीघ्र फल प्राप्ति के लिए यंत्र में अंकित मंत्र का नित्य एक माला जप करें।

मंत्र :- ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः ।

केतु यंत्र

केतु वायु तत्व और हस्व कद वाला ग्रह है। यह शरीर में धर्म, वात तथा रक्त को प्रभावित करता । इसके अशुभ होने से आलस्य, किसी भी काम में मन न लगना, शरीर पर चोट, वात पीड़ा, अलर्जी, चर्म रोग आदि होते हैं।

केतु का संबंध गुप्त विद्या, जासुसी कार्य, तंत्र मंत्र सिद्धि, धार्मिक यात्रा, दुःख, मानसिक शोक संताप शस्त्राघात आदि घटनाओं से विशेष रूप है। केतु के कारण जीवन में मानसिक संताप अनावश्यक भय, व्याधि पीड़ा होती है।

केतु यंत्र की पूजा विशेषतया मानसिक वेदना तथा अनावश्यक आकस्मिक व्याधियों से बचने के लिए की जाती है। यदि मन बार-बार अशांत रहता हो तो इस यंत्र की प्रतिष्ठा करके नित्य दर्शन, पूजन करने से मन में शांति बनती है जिससे मानसिक तथा शारीरिक रूप स्वास्थ्य लाभ होता है।

यंत्र का उपयोग जन्म कुंडली में यदि केतु ग्रह निर्बल अथवा अशुभ हो अथवा केतु की महादशा, अंतरदशा चल रही हो तो ऐसे समय में इस यंत्र को घर में स्थापित करके निष्ठापूर्वक नित्य पूजन, दर्शन से केतु ग्रह को शांति होती है।

भूत, प्रेत आदि अशुभ बाधाओं से ग्रसित होने पर इस यंत्र को शनिवार के दिन पूजित करके नित्य अपने पास रखने से इन बाधाओं से रक्षा होती है। यदि किसी बीमारी का डॉक्टरी इलाज के पश्चात भी पता न लग रहा हो तो ऐसी स्थिति में इस यंत्र के नित्य दर्शन पूजन से लाभ प्राप्त होता है। शीघ्र फल प्राप्ति के लिए यंत्र में अंकित मंत्र का नित्य एक माला जप करने से शीघ्र शुभ फल की प्राप्ति होती है।

मंत्र :- ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः केतवे नमः ।

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